(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

शान्तिपर्व (Mahabharat) - 12. शान्तिपर्व(महाभारत)


॥ श्रीः ॥
12.134. अध्यायः 134
Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Topics
भीष्मेण युधिष्ठिरंप्रति बलप्रशंसनम्॥ 1॥ तथा पापकारिणां तत्परिहारोपायकथनम्॥ 2॥


Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Text

भीष्म उवाच। 12-134-0x(5718)(70013)
`अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम्।'
अत्र कामन्दवचनं कीर्तयन्ति पुराविदः।
प्रत्यक्षावेव धर्मार्थौ क्षत्रियस्य विजानतः॥ 12-134-1(70014)
तौ तु न व्यवधातव्यौ परोक्षा धर्मयातना।
अधर्मो धर्म इत्येतद्यथा वृक्षफलं तथा॥ 12-134-2(70015)
धर्माधर्मफले जातु ददर्शेह न कश्चन।
वुभूषेद्बलमेवैतत्सर्वं बलवतो वशे॥ 12-134-3(70016)
श्रियं बलममात्यांश्च बलवानिह विन्दति।
यो ह्यनाढ्यः स पतितस्तदुच्छिष्टं यदल्पकम्॥ 12-134-4(70017)
बह्वपथ्ये बलवति न किंचित्क्रियते भयात्।
उभौ सत्याधिकारौ तौ त्रायेते महतो भयात्॥ 12-134-5(70018)
अति धर्माद्बलं मन्ये बलाद्धर्मः प्रवर्तते।
बले प्रतिष्ठितो धर्मो धरण्यामिव जंगमः॥ 12-134-6(70019)
धूमो वायोरिव वशे बलं धर्मोऽनुवर्तते।
अनीश्वरो बलं धर्मो द्रुमं वल्लीव संश्रिता॥ 12-134-7(70020)
वशे बलवतां धर्मः सुखं भोगवतामिव।
नास्त्यसाध्यं बलवतां सर्वं बलवता जितम्॥ 12-134-8(70021)
दुराचारः क्षीणबलः परिमाणं न गच्छति।
अथ तस्मादुद्विजते सर्वो लोको वृकादिव॥ 12-134-9(70022)
अपध्वस्तो ह्यवमतो दुःखं जीवति जीवितम्।
जीवितं यदधिक्षिप्तं यथैव मरणं तथा॥ 12-134-10(70023)
यदेवमाहुः पापेन चारित्रेण विवक्षितम्।
सुभृशं तप्यते तेन वाक्शल्येन परिक्षतः॥ 12-134-11(70024)
अत्रैतदाहुराचार्याः पापस्य परिमोक्षणे।
त्रयीं विद्यामुपासीत तथोपासीत वै द्विजान्॥ 12-134-12(70025)
प्रसादयेन्मधुरया वाचा चाप्यथ कर्मणा।
महामनाश्चैव भवेद्विवहेच्च महाकुले॥ 12-134-13(70026)
इत्यस्तीति वदेदेव परेषां कीर्तयेद्गुणान्।
जपेदुदकशीलः स्यात्पेशलो नातिजल्पकः॥ 12-134-14(70027)
ब्रह्म क्षत्रं संप्रविशेद्बहु कृत्वा सुदुष्करम्।
उच्यमानो हि लोकेन बहु तत्तदचिन्तयन्॥ 12-134-15(70028)
उपप्राप्यैवमाचारं क्षिप्रं बहुमतो भवेत्।
सुखं च वित्तं भुञ्जीत वृत्तेनैकेन गोपयेत्॥ 12-134-16(70029)
`अपि तेभ्यो मृगान्हत्वा नयेच्च सततं वने।
यस्मिन्न प्रतिगृह्णन्ति दस्युभोजनशङ्कया।'
लोके च लभते पूजां परत्रेह महत्फलम्॥ ॥ 12-134-17(70030)

इति श्रीमन्महाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि चतुस्त्रिंशदधिशततमोऽध्यायः॥ 134॥

Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Footnotes

12-134-2 यथा वृकपदंस्थेति झ. द. पाठः॥ 12-134-6 अति अतिशयितम्॥ 12-134-10 अपध्वस्तः ऐश्वर्याच्च्युतः॥ 12-134-12 अत्राधर्मेण धनार्जने कृते सति॥


Mahabharat- Hindi (Devanagari) 100000 shlokas

www.sanatanadharm.com - play store app (sanatana dharm)

"Bharathiya Sanatana Dharm" and Sanatana Dharmam & Dharmo rakshati Rakshitha logo are our trademarks. Unauthorised use of "Sanatana Dharmam & Dharmo rakshoati Rakshitha" and the logo is not allowed. Copyright © sanatanadharm.com All Rights Reserved . Made in India.